ग्रामीण विकास के पारंपरिक दृष्टिकोण में अक्सर गरीबी उन्मूलन को केवल वित्तीय ऋण या सब्सिडी तक सीमित मान लिया जाता है। लेकिन बिहार की 'जीविका' (JEEViKA) परियोजना ने इस धारणा को ध्वस्त करते हुए एक 'संस्थागत सुरक्षा कवच' (Institutional Safety Net) तैयार किया है। जहाँ पारंपरिक प्रणालियाँ 'टॉप-डाउन' दृष्टिकोण पर आधारित थीं, वहीं जीविका का त्रि-स्तरीय सामुदायिक ढांचा नीचे से ऊपर की ओर एक ऐसी क्रांति का नेतृत्व कर रहा है, जो 1.5 करोड़ ग्रामीण परिवारों तक पहुँचने का लक्ष्य रखती है। इस विशाल रणनीतिक रोडमैप के केंद्र में 10 लाख स्वयं सहायता समूह (SHG), 65,000 ग्राम संगठन (VO) और 1,600 संकुल स्तरीय संघ (CLF) की संरचना है, जो विकास के व्याकरण को बदल रही है।
यहाँ जीविका के CLF मॉडल से प्राप्त वे 5 रणनीतिक सबक हैं, जो प्रभावी नीति-निर्माण और जमीनी सशक्तिकरण का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
1. शक्ति का विकेंद्रीकरण: केवल वित्त नहीं, रणनीतिक प्रबंधन
जीविका की सफलता का आधार इसकी सुदृढ़ संगठनात्मक संरचना है। CLF इस पिरामिड की सबसे प्रभावशाली इकाई है, जो 20 से 40 ग्राम संगठनों (VOs) को एक सूत्र में पिरोती है। यह केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि 'रणनीतिक अभिसरण' (Strategic Convergence) का एक केंद्र है।
"एक संकुल स्तरीय संघ (CLF), 20 से 40 ग्राम संगठनों (VOs) का एक संघ होगा, जिसमें सभी सदस्य ग्राम संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इसका उद्देश्य ग्राम संगठन के सदस्यों का आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण करना है। यह सदस्य ग्राम संगठनों और स्वयं सहायता समूहों को सुदृढ़ करने के लिए निरंतर सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करने वाले मंच के रूप में कार्य करेगा।"
2. समावेशी शासन: हाशिए के समुदायों को 'निर्णायक भूमिका' में लाना
एक सामाजिक विकास विशेषज्ञ के रूप में, मैं CLF के शासन ढांचे को 'सामाजिक न्याय की प्रयोगशाला' मानता हूँ। यहाँ नेतृत्व केवल योग्यता पर नहीं, बल्कि संतुलित प्रतिनिधित्व पर आधारित है। समावेशिता सुनिश्चित करने के लिए यहाँ कड़े नीतिगत नियम लागू हैं:
- प्रतिनिधित्व का गणित: 12 सदस्यीय 'बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स' (BoD) में कम से कम 2 सदस्य SC/ST और 2 सदस्य EBC/BC वर्ग से होना अनिवार्य है।
- RGB में प्राथमिकता: 'प्रतिनिधि आम सभा' (RGB) में, प्रति 30 ग्राम संगठनों पर 5 SC/ST और 5 EBC/BC सदस्यों को प्राथमिकता दी जाती है।
- पदाधिकारियों का चयन: नीतिगत स्पष्टता के साथ यह निर्धारित है कि CLF के मुख्य पदाधिकारियों (अध्यक्ष, सचिव, कोषाध्यक्ष आदि) में निश्चित रूप से 1 सदस्य SC/ST समुदाय से होगा।
यह ढांचा यह सुनिश्चित करता है कि नीति-निर्माण की मेज पर समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज़ न केवल सुनी जाए, बल्कि वह निर्णायक भूमिका में भी हो।
3. 'सोशल एक्शन कमिटी': वित्तीय स्थिरता के लिए सामाजिक सुधार
अक्सर यह प्रश्न उठता है कि एक वित्तीय संस्था सामाजिक मुद्दों पर समय क्यों व्यय करे? जीविका का उत्तर है: 'सामाजिक सुरक्षा के बिना आर्थिक प्रगति अस्थायी है।' CLF की 'सोशल एक्शन कमिटी' (सामाजिक कार्रवाई समिति) पंचायतों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC/APHC) के साथ समन्वय कर एक 'ब्रिज' का कार्य करती है। इसके मुख्य हस्तक्षेप निम्नलिखित हैं:
- रणनीतिक अभिसरण: स्वास्थ्य, पोषण और स्वच्छता के मुद्दों पर सरकारी विभागों के साथ तालमेल बिठाकर सेवाओं की पहुँच सुनिश्चित करना।
- शिक्षा सहयोग योजना: यह मॉडल केवल ऋण तक सीमित नहीं है; यह कक्षा 9 से 12 तक के छात्र-छात्राओं के लिए 'शिक्षा सहयोग योजना' के तहत छात्रवृत्ति वितरण का प्रभावी प्रबंधन करता है।
- अधिकारिता: MGNREGA के तहत जॉब कार्ड पंजीकरण और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध मोर्चाबंदी करना।
4. लोकतांत्रिक रोटेशन: संस्थागत स्थिरता और नेतृत्व विकास
सत्ता का ठहराव किसी भी संस्था की जीवंतता को समाप्त कर सकता है। CLF मॉडल में 'नेतृत्व के रोटेशन' (Rotation of Leadership) का सिद्धांत संस्थागत निष्पक्षता का मूलमंत्र है।
नियमतः, हर दो साल में नेतृत्व के 1/3 हिस्से को बदला जाता है और अधिकतम कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। यहाँ एक सूक्ष्म 'पॉलिसी डिज़ाइन' देखने को मिलता है: प्रथम बार नियुक्त RGB सदस्यों को तत्काल मतदान का अधिकार मिलता है, जबकि बाद में जुड़ने वाले सदस्यों को इस अधिकार के लिए एक वर्ष की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। यह नियम संक्रमण काल (Transition) के दौरान संस्था की स्थिरता और अनुभव की निरंतरता को बनाए रखने के लिए बनाया गया है।
5. वित्तीय स्वायत्तता और फंड फ्लो (Fund Flow) की शुचिता
CLF केवल बचत का माध्यम नहीं है, बल्कि बैंकों और जिला परियोजना समन्वय इकाई (DPCU) के बीच एक सशक्त चैनल है। यह मॉडल वित्तीय संसाधनों के प्रवाह को विकेंद्रीकृत करता है:
- फंडिंग चैनल: 'सामुदायिक निवेश निधि' (CIF) और 'प्रारंभिक पूंजीकरण निधि' (ICF) जैसे फंड्स सीधे DPCU से CLF को प्राप्त होते हैं, जहाँ से इन्हें ग्राम संगठनों और अंततः समूहों को हस्तांतरित किया जाता है।
- सूक्ष्म बीमा (Micro Insurance): 'जनश्री बीमा योजना' के माध्यम से सदस्यों को एक सुरक्षा जाल प्रदान करना।
- कन्वर्जेंस चेकलिस्ट:
- बैंक लिंकेज और ऋण प्रबंधन।
- स्वास्थ्य कार्ड और पेंशन योजनाओं (वृद्धावस्था एवं विधवा पेंशन) का समन्वय।
- PDS और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की मॉनिटरिंग।
निष्कर्ष: भविष्य की राह
बिहार के गाँवों में जीविका का यह CLF मॉडल आज केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि 'सामुदायिक नेतृत्व' का एक वैश्विक बेंचमार्क बन चुका है। यह सिद्ध करता है कि यदि ग्रामीण महिलाओं को सही संरचनात्मक ढांचा और प्रशिक्षण दिया जाए, तो वे राज्य की सामाजिक-आर्थिक नियति को बदलने की शक्ति रखती हैं।
बिहार के गाँवों से उठी यह गूँज आज एक गंभीर प्रश्न हमारे नीति-निर्माताओं के सामने रखती है: "क्या यह जमीनी मॉडल भारत के अन्य राज्यों के लिए ग्रामीण विकास का एकमात्र स्थायी समाधान हो सकता है?"

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