बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई-मधेश के विस्तृत भू-भाग में माताओं द्वारा अपनी संतान के दीर्घ जीवन, आरोग्य और मंगल की कामना के लिए रखा जाने वाला 'जितिया' (जीवित्पुत्रिका या जिउतिया) व्रत लोक-आस्था का एक अद्वितीय और अमर प्रतीक है। यह कोई साधारण उपवास या केवल कर्मकांडीय पूजा-पद्धति नहीं है, बल्कि यह माँ की निश्चल ममता, स्त्री की कठोर साधना, लोक-गीतों की मिठास और पीढ़ियों से संजोई गई सामूहिक स्मृति का उत्सव है।
जितिया पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न रहकर, करुणा और मानवीय संवेदनाओं की एक जीवित सांस्कृतिक धरोहर को प्रदर्शित करता है। इसके केंद्र में राजा जीमूतवाहन की वह महान त्याग-गाथा निहित है, जिसमें एक राजा ने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ, पद या प्राणों की चिंता किए बिना एक अन्य प्राणी के पुत्र की रक्षा हेतु स्वयं को संकट में डाल दिया। यह लेख जितिया पर्व और राजा जीमूतवाहन के जीवन से जुड़े 5 ऐसे महत्वपूर्ण, संश्लेषित और विचारणीय पहलुओं को उजागर करता है, जो आज के आधुनिक समाज को भी करुणा, त्याग और नैतिक जीवन की नई दृष्टि प्रदान करते हैं।
1. नाम का ऐतिहासिक भ्रम: 12वीं सदी के विधि-वेत्ता बनाम पौराणिक राजा जीमूतवाहन
जितिया पर्व की सांस्कृतिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि का विश्लेषण करते समय राजा जीमूतवाहन के नाम को लेकर उत्पन्न होने वाले ऐतिहासिक भ्रम को स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है।
भारतीय साहित्य और इतिहास के पन्नों में 'जीमूतवाहन' नाम के दो पूर्णतः भिन्न संदर्भ मिलते हैं:
- पौराणिक एवं साहित्यिक राजा जीमूतवाहन: जितिया व्रत की कथा के नायक जीमूतवाहन संस्कृत साहित्य की समृद्ध परंपरा से आते हैं। इनका प्रमुख उल्लेख महाकवि हर्ष द्वारा रचित प्रसिद्ध संस्कृत नाटक 'नागानन्द' तथा 'कथासरित्सागर' की आख्यान-परंपरा में मिलता है। इन साहित्यिक ग्रंथों में इन्हें 'विद्याधर' वंश के धार्मिक और प्रजावत्सल राजा जीमूतकेतु का पुत्र बताया गया है। इनका राज्य 'कांचनपुर' था और इनका विवाह सिद्धों के राजा विश्वावसु की पुत्री मलयवती से हुआ था। राजसी वैभव के बावजूद जीमूतवाहन धर्म, दया और परोपकार को ही जीवन का सर्वोच्च आदर्श मानते थे।
- 12वीं शताब्दी के धर्मशास्त्री जीमूतवाहन: इतिहास में एक अन्य जीमूतवाहन का उल्लेख मिलता है, जो 12वीं शताब्दी (मध्यकालीन भारत) के प्रसिद्ध धर्मशास्त्री और कानून-वेत्ता थे। इनका संबंध बंगाल की विद्वत् परंपरा से था और ये हिंदू कानून के प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ 'दायभाग' के रचयिता थे।
समान नाम होने के कारण अक्सर इन्हें एक ही व्यक्ति मान लेने की भूल कर दी जाती है। किंतु ऐतिहासिक और साहित्यिक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि 'दायभाग' के रचयिता 12वीं सदी के बंगाली विद्वान थे, जबकि जितिया कथा के नायक 'नागानन्द' और 'कथासरित्सागर' में वर्णित विद्याधर वंश के अलौकिक राजा हैं। दोनों के संदर्भ और कालखंड पूर्णतः भिन्न हैं।
2. परोपकार की पराकाष्ठा: जब एक राजा ने दूसरे के पुत्र के लिए अपने प्राण दांव पर लगाए
राजपाठ त्यागकर पिता के साथ मलय पर्वत पर निवास करने के दौरान राजा जीमूतवाहन के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने लोक-इतिहास में त्याग की सर्वोच्च मिसाल कायम की। मलय पर्वत के समीप जीमूतवाहन ने एक अत्यंत दुखी युवक—नागकुमार शंखचूड़—और उसकी रोती हुई वृद्ध माता को देखा। नागों और गरुड़ के बीच हुए समझौते के तहत उस दिन शंखचूड़ की बारी गरुड़ के भोजन के रूप में बलि होने की थी। एक वृद्ध माँ को अपने पुत्र की निश्चित मृत्यु पर विलाप करते देख जीमूतवाहन का हृदय करुणा से भर उठा।
राजा जीमूतवाहन ने अपने पद, भावी जीवन या किसी व्यक्तिगत स्वार्थ का विचार किए बिना शंखचूड़ को उसके घर वापस भेज दिया और उसके स्थान पर स्वयं को गरुड़ के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। गरुड़ उन्हें नाग समझकर अपने पंजों में उठाकर ले गया। जब गरुड़ को जीमूतवाहन के वास्तविक परिचय और इस अभूतपूर्व त्याग का ज्ञान हुआ, तो वह इस असाधारण करुणा से स्तब्ध रह गया। राजा के इस बलिदान का परिणाम यह हुआ कि गरुड़ ने नागों की बलि लेने की वर्षों पुरानी परंपरा को सदा के लिए समाप्त कर दिया, जिससे अनगिनत प्राणियों के जीवन की रक्षा संभव हुई।
"सच्चा धर्म वह है जिसमें दूसरे के दुःख को देखकर मनुष्य निष्क्रिय न रहे।"
यह कथा जात-पात, कुल या समुदाय के संकीर्ण बंधनों से परे केवल विशुद्ध मानवीय संवेदना की मिसाल है। जीमूतवाहन ने यह विचार नहीं किया कि शंखचूड़ किस कुल का है; उन्होंने केवल एक माँ की व्याकुलता और एक पुत्र के संकट को देखा और निस्वार्थ भाव से उसकी ढाल बन गए।
3. 'लोक-विद्यालय' के रूप में मौखिक परंपरा और स्त्रियों का सांस्कृतिक संसार
मिथिला और संपूर्ण बिहार के लोक-जीवन में जितिया केवल एक व्रत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ियों तक ज्ञान हस्तांतरित करने का एक जीवंत माध्यम है।
- 'लोक-विद्यालय' (Folk School) की भूमिका: औपचारिक शिक्षा या पुस्तकों की अनुपलब्धता के दौर में भी गाँवों में बुजुर्ग महिलाएँ एकत्रित होकर दूसरी महिलाओं और बच्चों को जितिया की कथा सुनाया करती थीं। कथा-वाचन का यह पारंपरिक ढाँचा एक 'लोक-विद्यालय' की भाँति कार्य करता था, जहाँ बिना किसी लिखित पुस्तक के, सांस्कृतिक मूल्य, पारिवारिक अनुभव और नैतिक सिद्धांत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सहज रूप से हस्तांतरित होते रहे।
- शास्त्र की औपचारिकता से मुक्त लोकगीत: जितिया के लोकगीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे शास्त्रीय भाषा की औपचारिकता को त्यागकर लोकभाषा की सहज आत्मीयता को अपनाते हैं। इन गीतों में केवल धार्मिक पंक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि माँ की चिंता, संतान के लिए मंगलकामना और स्त्री-जीवन का भावनात्मक सच दर्ज होता है।
- स्त्रियों का सांस्कृतिक नेतृत्व: जितिया में स्त्रियाँ मात्र अनुष्ठान करने वाली श्रद्धालु नहीं हैं, बल्कि वे पूरी सांस्कृतिक विरासत की मुख्य संवाहक हैं। पूजा की तैयारी, कथा-वाचन, गीतों की रचना और रीतियों को बनाए रखने का संपूर्ण दायित्व स्त्रियाँ ही निभाती हैं, जिससे यह पर्व उनके अपने सांस्कृतिक संसार का मौखिक दस्तावेज़ बन जाता है।
4. साधना की परीक्षा: 'ओठगन' से 'निर्जला' उपवास का संकल्प और आधुनिक स्वास्थ्य
जितिया पर्व अपने कठोर नियमों और अनुशासित साधना के लिए जाना जाता है, जो मातृत्व के समर्पण को दर्शाता है।
- अनुष्ठानिक प्रक्रिया एवं 'निर्जला' संकल्प: पर्व का शुभारंभ पारंपरिक 'ओठगन' की रस्म से होता है, जिसके पश्चात माताओं द्वारा अत्यंत कठिन उपवास का संकल्प लिया जाता है। जितिया का मुख्य व्रत 'निर्जला' होता है, जिसमें संतान के दीर्घ जीवन और आरोग्य के लिए अन्न और जल का पूर्ण त्याग किया जाता है। लोक-विश्वास में इसे केवल शारीरिक संयम नहीं, बल्कि अगाध श्रद्धा, संकल्प और मातृत्व की कठिन परीक्षा माना गया है।
- आधुनिक स्वास्थ्य चेतना और संतुलन: इस महान परंपरा का सम्मान करते हुए, वर्तमान समय में एक व्यावहारिक और स्वास्थ्य-सचेत दृष्टिकोण अपनाना भी उतना ही आवश्यक है। लंबी अवधि तक अन्न-जल के बिना रहना प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक स्थिति के अनुकूल नहीं हो सकता। अतः लोक-आस्था की पवित्रता को बनाए रखते हुए, आधुनिक जीवन में अपनी व्यक्तिगत स्वास्थ्य स्थिति और चिकित्सकीय परामर्श (Medical Advice) को ध्यान में रखकर व्रत का पालन करना ही विवेकपूर्ण मार्ग है।
5. बदलते दौर में परंपरा: संयुक्त परिवारों से डिजिटल माध्यमों तक का सफर
आधुनिकता, शहरीकरण और बदलते सामाजिक परिवेश ने जितिया के पारंपरिक स्वरूप और उसके संवहन के तरीकों को भी प्रभावित किया है।
- सामाजिक बदलाव और प्रवासी समुदाय (Diaspora): संयुक्त परिवारों के बिखराव, एकाकी परिवारों के प्रसार और गाँवों से शहरों तथा विदेशों की ओर हुए पलायन ने पारंपरिक सामुदायिक कथा-वाचन की संरचना को बदला है।
- डिजिटल माध्यमों से लोक-आस्था का विस्तार: भौगोलिक दूरियों के बावजूद, इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने मिथिला और बिहार की इस पावन परंपरा को नया जीवन दिया है। आज देश-विदेश में बसे प्रवासी समुदाय डिजिटल मंचों के माध्यम से जितिया के लोकगीतों, कथाओं और पूजा-विधियों से जुड़ रहे हैं, जिससे इस परंपरा का वैश्विक विस्तार हुआ है।
- मूल चेतना को संजोने की चुनौती: इस डिजिटल विस्तार के बीच सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यह पर्व मात्र एक औपचारिक कर्मकांड या बाह्य प्रदर्शन बनकर न रह जाए। इसके पीछे छिपे त्याग, करुणा, निस्वार्थ परोपकार और मातृत्व के मूल भाव को संजोकर भावी पीढ़ियों तक पहुँचाना ही इसका वास्तविक उद्देश्य होना चाहिए।
निष्कर्ष एवं चिंतन
जितिया केवल तिथियों और उपवास का संकलन नहीं है, बल्कि यह मगध, अंग, बज्जी, भोजपुर और मिथिला की जन-स्मृति में रचा-बसा एक ऐसा सांस्कृतिक स्पंदन है जहाँ धर्म, लोक-साहित्य और सामाजिक मूल्य एक साथ प्रवाहित होते हैं। एक माँ की अगाध ममता जहाँ इस व्रत की नींव है, वहीं राजा जीमूतवाहन का निष्काम त्याग इसे एक अमर नैतिक ऊँचाई प्रदान करता है। समय बदला, पीढ़ियाँ बदलीं और जीवन की गति बदल गई, किंतु सदियों बाद भी जीमूतवाहन की यह कथा जन-मानस में इसलिए जीवित है क्योंकि यह करुणा के शाश्वत सत्य को रेखांकित करती है।
आज जब हमारा समाज अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, भौतिकता और व्यक्तिगत स्वार्थों की ओर बढ़ रहा है, तब राजा जीमूतवाहन का जीवन हमारे सामने एक गहरा, विचारणीय प्रश्न छोड़ता है:
"क्या आज के अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और स्वार्थी दौर में, हम जीमूतवाहन के इस संदेश को अपने जीवन में उतार सकते हैं कि जीवन का असली मूल्य केवल अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि दूसरों के दुःख को समझने और उनकी रक्षा करने में है?"
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